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Thirukkural in Hindi Chapter 96 to 100 - तिरुक्कूरळ

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Sanskrit Text Thiruvalluvar Thirukkural in Hindi

तिरुक्कूरळ - हिन्दी अनुवाद Chapter 96-100
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Thirukkural in Hindi, Chapters 96 to 100
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Chapters 91 to 95 · All chapters · Chapter list · Chapters 101 to 105

Each chapter has ten verses. The Hindi text is the translation of M.G. Venkatakrishnan (1998).

भाग–२: अर्थ- कांड

अध्याय 96. कुलीनता
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951 लज्जा, त्रिकरण-एकता, इन दोनों का जोड़ ।सहज मिले नहिं और में, बस कुलीन को छोड़ ॥
952 सदाचार लज्जा तथा, सच्चाई ये तीन ।इन सब से विचलित कभी, होते नहीं कुलीन ॥
953 सुप्रसन्न मुख प्रिय वचन, निंदा-वर्जन दान ।सच्चे श्रेष्ठ कुलीन हैं, चारों का संस्थान ॥
954 कोटि कोटि धन ही सही, पायें पुरुष कुलीन ।तो भी वे करते नहीं, रहे कर्म जो हीन ॥
955 हाथ खींचना ही पड़े, यद्यपि हो कर दीन ।छोडें वे न उदारता, जिनका कुल प्राचीन ॥
956 पालन करते जी रहें, जो निर्मल कुल धर्म ।यों जो हैं वे ना करें, छल से अनुचित कर्म ॥
957 जो जन बडे कुलीन हैं, उन पर लगा कलंक ।नभ में चन्द्र-कलंक सम, प्रकटित हो अत्तंग ॥
958 रखते सुगुण कुलीन के, जो निकले निःस्नेह ।उसके कुल के विषय में, होगा ही संदेह ॥
959 अंकुर करता है प्रकट, भू के गुण की बात ।कुल का गुण, कुल-जात की, वाणी करती ज्ञात ॥
960 जो चाहे अपना भला, पकडे लज्जा-रीत ।जो चाहे कुल-कानि को, सब से रहे विनीत ॥

अध्याय 97. मान
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961 जीवित रहने के लिये, यद्यपि है अनिवार्य ।फिर भी जो कुल-हानिकर, तज देना वे कार्य ॥
962 जो हैं पाना चाहते, कीर्ति सहित सम्मान ।यश-हित भी करते नहीं, जो कुल-हित अपमान ॥
963 सविनय रहना चाहिये, रहते अति संपन्न ।तन कर रहना चाहिये, रहते बड़ा विपन्न ॥
964 गिरते हैं जब छोड़कर, निज सम्मानित स्थान ।नर बनते हैं यों गिरे, सिर से बाल समान ॥
965 अल्प घुंघची मात्र भी, करते जो दुष्काम ।गिरि सम ऊँचे क्यों न हों, होते हैं बदनाम ॥
966 न तो कीर्ति की प्राप्ति हो, न हो स्वर्ग भी प्राप्त ।निंदक का अनुचर बना, तो औ’ क्या हो प्राप्त ॥
967 निंदक का अनुचर बने, जीवन से भी हेय ।‘ज्यों का त्यों रह मर गया’, कहलाना है श्रेय ॥
968 नाश काल में मान के, जो कुलीनता-सत्व ।तन-रक्षित-जीवन भला, क्या देगा अमरत्व ॥
969 बाल कटा तो त्याग दे, चमरी-मृग निज प्राण ।उसके सम नर प्राण दें, रक्षा-हित निज मान ॥
970 जो मानी जीते नहीं, होने पर अपमान ।उनके यश को पूज कर, लोक करे गुण-गान ॥

अध्याय 98. महानता
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971 मानव को विख्याति दे, रहना सहित उमंग ।‘जीयेंगे उसके बिना’, है यों कथन कलक ॥
972 सभी मनुज हैं जन्म से, होते एक समान ।गुण-विशेष फिर सम नहीं, कर्म-भेद से जान ॥
973 छोटे नहिं होते बड़े, यद्यपि स्थिति है उच्च ।निचली स्थिति में भी बड़े, होते हैं नहिं तुच्छ ॥
974 एक निष्ठ रहती हुई, नारी सती समान ।आत्म-संयमी जो रहा, उसका हो बहुमान ॥
975 जो जन महानुभव हैं, उनको है यह साध्य ।कर चुकना है रीति से, जो हैं कार्य असाध्य ॥
976 छोटों के मन में नहीं, होता यों सुविचार ।पावें गुण नर श्रेष्ठ का, कर उनका सत्कार ॥
977 लगती है संपन्नता, जब ओछों के हाथ ।तब भी अत्याचार ही, करे गर्व के साथ ॥
978 है तो महानुभावता, विनयशील सब पर्व ।अहम्मन्य हो तुच्छता, करती है अति गर्व ॥
979 अहम्मन्यता-हीनता, है महानता बान ।अहम्मन्यता-सींव ही, ओछापन है जान ॥
980 दोषों को देना छिपा, है महानता-भाव ।दोषों की ही घोषणा, है तुच्छत- स्वभाव ॥

अध्याय 99. सर्वगुण-पूर्णता
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981 जो सब गुण हैं पालते, समझ योग्य कर्तव्य ।उनकों अच्छे कार्य सब, सहज बने कर्तव्य ॥
982 गुण-श्रेष्ठता-लाभ ही, महापुरुष को श्रेय ।अन्य लाभ की प्राप्ति से, श्रेय न कुछ भी ज्ञेय ॥
983 लोकोपकारिता, दया, प्रेम हया औ’ साँच ।सुगुणालय के थामते, खंभे हैं ये पाँच ॥
984 वध-निषेध-व्रत-लाभ ही, तप को रहा प्रधान ।पर-निंदा वर्जन रही, गुणपूर्णता महान ॥
985 विनयशीलता जो रही, बलवानों का सार ।है रिपु-रिपुता नाश-हित, सज्जन का हथियार ॥
986 कौन कसौटी जो परख, जाने गुण-आगार ।है वह गुण जो मान ले, नीचों से भी हार ॥
987 अपकारी को भी अगर, किया नहीं उपकार ।होता क्या उपयोग है, हो कर गुण-आगार ॥
988 निर्धनता नर के लिये, होता नहिं अपमान ।यदि बल है जिसको कहें, सर्व गुणों की खान ॥
989 गुण-सागर के कूल सम, जो मर्यादा-पाल ।मर्यादा छोड़े नहीं, यद्यपि युगान्त-काल ॥
990 घटता है गुण-पूर्ण का, यदि गुण का आगार ।तो विस्तृत संसार भी, ढो सकता नहिं भार ॥

अध्याय 100. शिष्टाचार
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991 मिलनसार रहते अगर, सब लोगों को मान ।पाना शिष्टाचार है, कहते हैं आसान ॥
992 उत्तम कुल में जन्म औ’, प्रेम पूर्ण व्यवहार ।दोनों शिष्टाचार के, हैं ही श्रेष्ठ प्रकार ॥
993 न हो देह के मेल से, श्रेष्ठ जनों का मेल ।आत्माओं के योग्य तो, हैं संस्कृति का मेल ॥
994 नीति धर्म को चाहते, जो करते उपकार ।उनके शिष्ट स्वभाव को, सराहता संसार ॥
995 हँसी खेल में भी नहीं, निंदा करना इष्ट ।पर-स्वभाव ज्ञाता रहें, रिपुता में भी शिष्ट ॥
996 शिष्टों के आधार पर, टिकता है संसार ।उनके बिन तो वह मिले, मिट्टी में निर्धार ॥
997 यद्यपि हैं रेती सदृश, तीक्षण बुद्धि-निधान ।मानव-संस्कृति के बिना, नर हैं वृक्ष समान ॥
998 मित्र न रह जो शत्रु हैं, उनसे भी व्यवहार ।सभ्य पुरुष का नहिं किया, तो वह अधम विचार ॥
999 जो जन कर सकते नहीं, प्रसन्न मन व्यवहार ।दिन में भी तम में पड़ा, है उनका संसार ॥
1000 जो है प्राप्त असभ्य को, धन-सम्पत्ति अमेय ।कलश-दोष से फट गया, शुद्ध दूध सम ज्ञेय ॥

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