↓Skip to main content
  1. Samskrut Yatra Blog/

Thirukkural in Hindi Chapter 76 to 80 - तिरुक्कूरळ

·969 words·5 mins· loading · ·
Sanskrit Text Thiruvalluvar Thirukkural in Hindi

तिरुक्कूरळ - हिन्दी अनुवाद Chapter 76-80
#

Thirukkural in Hindi, Chapters 76 to 80
#

Chapters 71 to 75 · All chapters · Chapter list · Chapters 81 to 85

Each chapter has ten verses. The Hindi text is the translation of M.G. Venkatakrishnan (1998).

भाग–२: अर्थ- कांड

अध्याय 76. वित्त-साधन-विधि
#

751 धन जो देता है बना, नगण्य को भी गण्य ।उसे छोड़ कर मनुज को, गण्य वस्तु नहिं अन्य ॥
752 निर्धन लोगो का सभी, करते हैं अपमान ।धनवनों का तो सभी, करते हैं सम्मन ॥
753 धनरूपी दीपक अमर, देता हुआ प्रकाश ।मनचाहा सब देश चल, करता है नम-नाश ॥
754 पाप-मार्ग को छोड़कर, न्याय रीति को जान ।अर्जित धन है सुखद औ’, करता धर्म प्रदान ॥
755 दया और प्रिय भाव से, प्राप्त नहीं जो वित्त ।जाने दो उस लाभ को, जमे न उसपर चित्त ॥
756 धन जिसका वारिस नहीं, धन चूँगी से प्राप्त ।विजित शत्रु का भेंट-धन, धन हैं नृप हित आप्त ॥
757 जन्माता है प्रेम जो, दयारूप शिशु सुष्ट ।पालित हो धन-धाय से, होता है बह पुष्ट ॥
758 निज धन रखते हाथ में, करना कोई कार्य ।गिरि पर चढ़ गज-समर का, ईक्षण सदृश विचार्य ॥
759 शत्रु-गर्व को चिरने, तेज शास्त्र जो सिद्ध ।धन से बढ़ कर है नहीं, सो संग्रह कर वित्त ॥
760 धर्म, काम दोनों सुलभ, मिलते हैं इक साथ ।न्यायार्जित धन प्रचुर हो, लगता जिसके हाथ ॥

अध्याय 77. सैन्य-माहात्म्य
#

761 सब अंगों से युक्त हो, क्षत से जो निर्भीक ।जयी सैन्य है भूप के, ऐश्वर्यों में नीक ॥
762 छोटा फिर भी विपद में, निर्भय सहना चोट ।यह साहस संभव नहीं, मूल सैन्य को छोड़ ॥
763 चूहे-शत्रु समुद्र सम, गरजें तो क्या कष्ट ।सर्पराज फुफकारते, होते हैं सब नष्ट ॥
764 अविनाशी रहते हुए, छल का हो न शिकार ।पुश्तैनी साहस जहाँ, वही सैन्य निर्धार ॥
765 क्रोधिक हो यम आ भिड़े, फिर भी हो कर एक ।जो समर्थ मुठ-भेड़ में, सैन्य वही है नेक ॥
766 शौर्य, मान, विश्वस्तता, करना सद्‍व्यवहार ।ये ही सेना के लिये, रक्षक गुण हैं चार ॥
767 चढ़ आने पर शत्रु के, व्यूह समझ रच व्यूह ।रोक चढ़ाई खुद चढ़े, यही सैन्य की रूह ॥
768 यद्यपि संहारक तथा, सहन शक्ति से हीन ।तड़क-भड़क से पायगी, सेना नाम धुरीण ॥
769 लगातार करना घृणा, क्षय होना औ’ दैन्य ।जिसमें ये होते नहीं, पाता जय वह सैन्य ॥
770 रखने पर भी सैन्य में, अगणित स्थायी वीर ।स्थायी वह रहता नहीं, बिन सेनापति धीर ॥

अध्याय 78. सैन्य-साहस
#

771 डटे रहो मत शत्रुओ, मेरे अधिप समक्ष ।डट कर कई शिला हुए, मेरे अधिप समक्ष ॥
772 वन में शश पर जो लगा, धरने से वह बाण ।गज पर चूके भाल को, धरने में है मान ॥
773 निर्दय साहस को कहें, महा धीरता सार ।संकट में उपकार है, उसकी तीक्षण धार ॥
774 कर-भाला गज पर चला, फिरा खोजते अन्य ।खींच भाल छाती लगा, हर्षित हुआ सुधन्य ॥
775 क्रुद्ध नेत्र यदि देख कर, रिपु का भाल-प्रहार ।झपकेंगे तो क्या नहीं, वह वीरों को हार ॥
776 ‘गहरा घाव लगा नहीं’, ऐसे दिन सब व्यर्थ ।बीते निज दिन गणन कर, यों मानता समर्थ ॥
777 जग व्यापी यश चाहते, प्राणों की नहिं चाह ।ऐसों का धरना कड़ा, शोभाकर है, वाह ॥
778 प्राण-भय-रहित वीर जो, जब छिड़ता है युद्ध ।साहस खो कर ना रुकें, नृप भी रोकें क्रुद्ध ॥
779 प्रण रखने हित प्राण भी, छोड़ेंगे जो चण्ड ।कौन उन्हें प्रण-भंग का, दे सकता है दण्ड़ ॥
780 दृग भर आये भूप के, सुन जिसका देहांत ।ग्रहण योग्य है माँग कर, उसका जैसा अंत ॥

अध्याय 79. मैत्री
#

781 करने को मैत्री सदृश, कृति है कौन महान ।दुर्लभ-रक्षक शत्रु से, उसके कौन समान ॥
782 प्राज्ञ मित्रता यों बढ़े, यथा दूज का चाँद ।मूर्ख मित्रता यों घटे, ज्यों पूनो के बाद ॥
783 करते करते अध्ययन्, अधिक सुखद ज्यों ग्रन्थ ।परिचय बढ़ बढ़ सुजन की, मैत्री दे आनन्द ॥
784 हँसी-खेल करना नहीं, मैत्री का उपकार ।आगे बढ़ अति देख कर, करना है फटकार ॥
785 परिचय औ’ संपर्क की, नहीं ज़रूरत यार ।देता है भावैक्य ही, मैत्री का अधिकार ॥
786 केवल मुख खिल जाय तो, मैत्री कहा न जाय ।सही मित्रता है वही, जिससे जी खिल जाय ॥
787 चला सुपथ पर मित्र को, हटा कुपथ से दूर ।सह सकती दुख विपद में, मैत्री वही ज़रूर ॥
788 ज्यों धोती के खिसकते, थाम उसे ले हस्त ।मित्र वही जो दुःख हो, तो झट कर दे पस्त ॥
789 यथा शक्ति सब काल में, भेद बिना उपकार ।करने की क्षमता सुदृढ़, है मैत्री-दरबार ॥
790 ‘ऐसे ये मेरे लिये’, ‘मैं हूँ इनका यार’ ।मैत्री की महिमा गयी, यों करते उपचार ॥

अध्याय 80. मैत्री की परख
#

791 जाँचे बिन मैत्री सदृश, हानि नहीं है अन्य ।मित्र बना तो छूट नहीं, जिसमें वह सौजन्य ॥
792 परख परख कर जो नहीं, किया गया सौहार्द ।मरण दिलाता अन्त में, यों, करता वह आर्त ॥
793 गुण को कुल को दोष को, जितने बन्धु अनल्प ।उन सब को भी परख कर, कर मैत्री का कल्प ॥
794 जो लज्जित बदनाम से, रहते हैं कुलवान ।कर लो उनकी मित्रता, कर भी मूल्य-प्रदान ॥
795 झिड़की दे कर या रुला, समझावे व्यवहार ।ऐसे समर्थ को परख, मैत्री कर स्वीकार ॥
796 होने पर भी विपद के, बड़ा लाभ है एक ।मित्र-खेत सब मापता, मान-दंड वह एक ॥
797 मूर्खों के सौहार्द से, बच कर तजना साफ़ ।इसको ही नर के लिये, कहा गया है लाभ ॥
798 ऐसे कर्म न सोचिये, जिनसे घटे उमंग ।मित्र न हो जो दुख में, छोड़ जायगा संग ॥
799 विपद समय जो बन्धु जन, साथ छोड़ दें आप ।मरण समय भी वह स्मरण, दिल को देगा ताप ॥
800 निर्मल चरित्रवान की, मैत्री लेना जोड़ ।कुछ दे सही अयोग्य की, मैत्री देना छोड़ ॥

Chapters 71 to 75 · All chapters · Chapter list · Chapters 81 to 85

Download the Hindi PDF

Related

Thirukkural in Hindi Chapter 11 to 15 - तिरुक्कूरळ
·910 words·5 mins· loading
Sanskrit Text Thiruvalluvar Thirukkural in Hindi
तिरुक्कूरळ - हिन्दी अनुवाद Chapter 11-15 # Thirukkural in Hindi, Chapters 11 to 15 # Chapters 6 to …
Thirukkural in Hindi Chapter 16 to 20 - तिरुक्कूरळ
·922 words·5 mins· loading
Sanskrit Text Thiruvalluvar Thirukkural in Hindi
तिरुक्कूरळ - हिन्दी अनुवाद Chapter 16-20 # Thirukkural in Hindi, Chapters 16 to 20 # Chapters 11 to …
Thirukkural in Hindi Chapter 21 to 25 - तिरुक्कूरळ
·932 words·5 mins· loading
Sanskrit Text Thiruvalluvar Thirukkural in Hindi
तिरुक्कूरळ - हिन्दी अनुवाद Chapter 21-25 # Thirukkural in Hindi, Chapters 21 to 25 # Chapters 16 to …
Thirukkural in Hindi Chapter 26 to 30 - तिरुक्कूरळ
·929 words·5 mins· loading
Sanskrit Text Thiruvalluvar Thirukkural in Hindi
तिरुक्कूरळ - हिन्दी अनुवाद Chapter 26-30 # Thirukkural in Hindi, Chapters 26 to 30 # Chapters 21 to …
Thirukkural in Hindi Chapter 31 to 35 - तिरुक्कूरळ
·945 words·5 mins· loading
Sanskrit Text Thiruvalluvar Thirukkural in Hindi
तिरुक्कूरळ - हिन्दी अनुवाद Chapter 31-35 # Thirukkural in Hindi, Chapters 31 to 35 # Chapters 26 to …