
तिरुक्कूरळ - हिन्दी अनुवाद Chapter 61-65#
Thirukkural in Hindi, Chapters 61 to 65#
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Each chapter has ten verses. The Hindi text is the translation of M.G. Venkatakrishnan (1998). Chapter 65 was missing from that Hindi text. Those ten verses are translated here from the English in the source file, in the same couplet style.
भाग–२: अर्थ- कांड
अध्याय 61. आलस्यहीनता#
601 जब तम से आलस्य के, आच्छादित हो जाय ।अक्षय दीप कुटुंब का, मंद मंद बुझ जाय ॥
602 जो चाहें निज वंश का, बना रहे उत्कर्ष ।नाश करें आलस्य का, करते उसका धर्ष ॥
603 गोद लिये आलस्य को, जो जड़ करे विलास ।होगा उसके पूर्व ही, जात-वंश का नाश ॥
604 जो सुस्ती में मग्न हों, यत्न बिना सुविशेष ।तो उनका कुल नष्ट हो, बढ़ें दोष निःशेष ॥
605 दीर्घसूत्रता, विस्मरण, सुस्ती, निद्रा-चाव ।जो जन चाहें डूबना, चारों हैं प्रिय नाव ॥
606 सार्वभौम की श्री स्वयं, चाहे आवे पास ।तो भी जो हैं आलसी, पावें नहिं फल ख़ास ॥
607 सुस्ती-प्रिय बन, यत्न सुठि, करते नहिं जो लोग ।डांट तथा उपहास भी, सुनते हैं वे लोग ॥
608 घर कर ले आलस्य यदि, रह कुलीन के पास ।उसके रिपु के वश उसे, बनायगा वह दास ॥
609 सुस्ती-पालन बान का, कर देगा यदि अंत ।वंश और पुरुषार्थ में, लगे दोष हों अंत ॥
610 क़दम बढ़ा कर विष्णु ने, जिसे किया था व्याप्त ।वह सब आलसहीन नृप, करे एकदम प्राप्त ॥
अध्याय 62. उद्यमशीलता#
611 दुष्कर यह यों समझकर, होना नहीं निरास ।जानो योग्य महानता, देगा सतत प्रयास ॥
612 ढीला पड़ना यत्न में, कर दो बिलकुल त्याग ।त्यागेंगे जो यत्न को, उन्हें करे जग त्याग ॥
613 यत्नशीलता जो रही, उत्तम गुणस्वरूप ।उसपर स्थित है श्रेष्ठता, परोपकार स्वरूप ॥
614 यों है उद्यमरहित का, करना परोपकार ।कोई कायर व्यर्थ ज्यों, चला रहा तलवार ॥
615 जिसे न सुख की चाह है, कर्म-पूर्ति है चाह ।स्तंभ बने वह थामता, मिटा बन्धुजन-आह ॥
616 बढ़ती धन-संपत्ति की, कर देता है यत्न ।दारिद्रय को घुसेड़ कर, देता रहे अयत्न ॥
617 करती है आलस्य में, काली ज्येष्ठा वास ।यत्नशील के यत्न में, कमला का है वास ॥
618 यदि विधि नहिं अनुकूल है, तो न किसी का दोष ।खूब जान ज्ञातव्य को, यत्न न करना दोष ॥
619 यद्यपि मिले न दैववश, इच्छित फल जो भोग्य ।श्रम देगा पारिश्रमिक, निज देह-श्रम-योग्य ॥
620 विधि पर भी पाते विजय, जो हैं उद्यमशील ।सतत यत्न करते हुए, बिना किये कुछ ढील ॥
अध्याय 63. संकट में अनाकुलता#
621 जब दुख-संकट आ पड़े, तब करना उल्लास ।तत्सम कोई ना करे, भिड़ कर उसका नाश ॥
622 जो आवेगा बाढ़ सा, बुद्धिमान को कष्ट ।मनोधैर्य से सोचते, हो जावे वह नष्ट ॥
623 दुख-संकट जब आ पड़े, दुखी न हो जो लोग ।दुख-संकट को दुख में, डालेंगे वे लोग ॥
624 ऊबट में भी खींचते, बैल सदृष जो जाय ।उसपर जो दुख आ पड़े, उस दुख पर दुख आय ॥
625 दुख निरंतर हो रहा, फिर भी धैर्य न जाय ।ऐसों को यदि दुख हुआ, उस दुख पर दुख आय ॥
626 धन पा कर, आग्रह सहित, जो नहिं करते लोभ ।धन खो कर क्या खिन्न हो, कभी करेंगे क्षोभ ॥
627 देह दुख का लक्ष्य तो, होती है यों जान ।क्षुब्ध न होते दुख से, जो हैं पुरुष महान ॥
628 विधिवश होता दुख है, यों जिसको है ज्ञान ।तथा न सुख की चाह भी, दुखी न हो वह प्राण ॥
629 सुख में सुख की चाह से, जो न करेगा भोग ।दुःखी होकर दुःख में, वह न करेगा शोक ॥
630 दुख को भी सुख सदृश ही, यदि ले कोई मान ।तो उसको उपलब्ध हो, रिपु से मानित मान ॥
अध्याय 64. अमात्य#
631 साधन, काल, उपाय औ’, कार्यसिद्धि दुस्साध्य ।इनका श्रेष्ठ विधान जो, करता वही अमात्य ॥
632 दृढ़ता, कुल-रक्षण तथा, यत्न, सुशिक्षा, ज्ञान ।पाँच गुणों से युक्त जो, वही अमात्य सुजान ॥
633 फूट डालना शत्रु में, पालन मैत्री-भाव ।लेना बिछुड़ों को मिला,योग्य आमात्य-स्वभाव ॥
634 विश्लेषण करता तथा, परख कार्य को साध्य ।दृढ़ता पूर्वक मंत्रणा, देता योग्य अमात्य ॥
635 धर्म जान, संयम सहित, ज्ञानपूर्ण कर बात ।सदा समझता शक्ति को, साथी है वह ख्यात ॥
636 शास्त्र जानते जो रहा, सूक्ष्म बुद्धि का भौन ।उसका करते सामना, सूक्ष्म प्रश्न अति कौन ॥
637 यद्यपि विधियों का रहा, शास्त्र रीति से ज्ञान ।फिर भी करना चाहिये, लोकरीति को जान ॥
638 हत्या कर उपदेश की, खुद हो अज्ञ नरेश ।फिर भी धर्म अमात्य का, देना दृढ़ उपदेश ॥
639 हानि विचारे निकट रह, यदि दुर्मंत्री एक ।उससे सत्तर कोटि रिपु, मानों बढ़ कर नेक ॥
640 यद्यपि क्रम से सोच कर, शुरू करे सब कर्म ।जिनमें दृढ़ क्षमता नहीं, करें अधूरा कर्म ॥
अध्याय 65. वाक्-पटुत्व#
Translated from English.
641 नर की जितनी संपदा, वाणी सबसे मान ।उसके समान और नहीं, कोई दूसरा मान ॥
642 उन्नति हो अथवा पतन, जीभ ही मूल जान ।सो अनर्गल वचन से, रहना सावधान ॥
643 योग्य वचन का सार जो, बाँधे मित्र अधिक ।शत्रु भी कान लगाये, सुनने को अधिक ॥
644 श्रोता की प्रकृति जान, उसी भाँति कह बैन ।इससे बड़ा न धर्म है, न इससे बड़ा धन ॥
645 ऐसा कहो वचन जो, हो अजेय प्रमाण ।उसे खंडित कर सके, कोई नहीं निदान ॥
646 श्रोता और सुनना चाहे, यों कहो निज बैन ।पर का अर्थ भी गहो, यही महान् की बान ॥
647 भय और भ्रम से मुक्त जो, वाणी का प्रवीण ।वचन-युद्ध में उसको, जीते कौन प्रवीण ॥
648 सुघड़ मोहक वचन जो, कहने में प्रवीण ।उनके पास झट जुटे, सारा जग प्रवीण ॥
649 थोड़े निर्दोष शब्द का, जिनको नहिं ज्ञान ।बहुत बोलने की लगन, रही उन्हीं की बान ॥
650 औरों को न समझा सकें, सीखा जो ज्ञान ।वे सुगंध-हीन खिले फूल, गुच्छे के समान ॥
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