
तिरुक्कूरळ - हिन्दी अनुवाद Chapter 21-25#
Thirukkural in Hindi, Chapters 21 to 25#
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Each chapter has ten verses. The Hindi text is the translation of M.G. Venkatakrishnan (1998).
भाग–१: धर्म- कांड
अध्याय 21. पाप-भीरुता#
201 पाप-कर्म के मोह से, डरें न पापी लोग ।उससे डरते हैं वही, पुण्य-पुरुष जो लोग ॥
202 पाप- कर्म दुखजनक हैं, यह है उनकी रीत ।पावक से भीषण समझ, सो होना भयभीत ॥
203 श्रेष्ठ बुद्धिमत्ता कहें, करके सुधी विचार ।अपने रिपु का भी कभी, नहिं करना अपकार ॥
204 विस्मृति से भी नर नहीं, सोचे पर की हानि ।यदि सोचे तो धर्म भी, सोचे उसकी हानि ॥
205 ‘निर्धन हूँ मैं’, यों समझ, करे न कोई पाप ।अगर किया तो फिर मिले, निर्धनता-अभिशाप ॥
206 दुख से यदि दुष्कर्म के, बचने की है राय ।अन्यों के प्रति दुष्टता, कभी नहीं की जाय ॥
207 अति भयकारी शत्रु से, संभव है बच जाय ।पाप-कर्म की शत्रुता, पीछा किये सताय ॥
208 दुष्ट- कर्म जो भी करे, यों पायेगा नाश ।छोड़े बिन पौरों तले, छाँह करे ज्यों वास ॥
209 कोई अपने आपको, यदि करता है प्यार ।करे नहीं अत्यल्प भी, अन्यों का अपचार ॥
210 नाशरहित उसको समझ, जो तजकर सन्मार्ग ।पाप-कर्म हो नहिं करे, पकड़े नहीं कुमार्ग ॥
अध्याय 22. लोकोपकारिता#
211 उपकारी नहिं चाहते, पाना प्रत्युपकार ।बादल को बदला भला, क्या देता संसार ॥
212 बहु प्रयत्न से जो जुड़ा, योग्य व्यक्ति के पास ।लोगों के उपकार हित, है वह सब धन-रास ॥
213 किया भाव निष्काम से, जनोपकार समान ।स्वर्ग तथा भू लोक में दुष्कर जान ॥
214 ज्ञाता शिष्टाचार का, है मनुष्य सप्राण ॥मृत लोगों में अन्य की, गिनती होती जान ॥
215 पानी भरा तड़ाग ज्यों, आवे जग का काम ।महा सुधी की संपदा, है जन-मन-सुख धाम ॥
216 शिष्ट जनों के पास यदि, आश्रित हो संपत्ति ।ग्राम-मध्य ज्यों वृक्षवर, पावे फल-संपत्ति ॥
217 चूके बिन ज्यों वृक्ष का, दवा बने हर अंग ।त्यों धन हो यदि वह रहे, उपकारी के संग ॥
218 सामाजिक कर्तव्य का, जिन सज्जन को ज्ञान ।उपकृति से नहिं चूकते, दारिदवश भी जान ॥
219 उपकारी को है नहीं, दरिद्रता की सोच ।‘मैं कृतकृत्य नहीं हुआ’ उसे यही संकोच ॥
220 लोकोपकारिता किये, यदि होगा ही नाश ।अपने को भी बेच कर, क्रय-लायक वह नाश ॥
अध्याय 23. दान#
221 देना दान गरीब को, है यथार्थ में दान ।प्रत्याशा प्रतिदान की, है अन्य में निदान ॥
222 मोक्ष-मार्ग ही क्यों न हो, दान- ग्रहण अश्रेय ।यद्यपि मोक्ष नहीं मिले, दान-धर्म ही श्रेय ॥
223 ‘दीन-हीन हूँ’ ना कहे, करता है यों दान ।केवल प्राप्य कुलीन में, ऐसी उत्तम बान ॥
224 याचित होने की दशा, तब तक रहे विषण्ण ।जब तक याचक का वदन, होगा नहीं प्रसन्न ॥
225 क्षुधा-नियन्त्रण जो रहा, तपोनिष्ठ की शक्ति ।क्षुधा-निवारक शक्ति के, पीछे ही वह शक्ति ॥
226 नाशक-भूक दरिद्र की, कर मिटा कर दूर । वह धनिकों को चयन हित, बनता कोष ज़रूर ॥
227 भोजन को जो बाँट कर, किया करेगा भोग ।उसे नहीं पीड़ित करे, क्षुधा भयंकर रोग ॥
228 धन-संग्रह कर खो रहा, जो निर्दय धनवान ।दे कर होते हर्ष का, क्या उसको नहिं ज्ञान ॥
229 स्वयं अकेले जीमना, पूर्ति के हेतु ।याचन करने से अधिक, निश्चय दुख का हेतु ॥
230 मरने से बढ़ कर नहीं, दुख देने के अर्थ ।सुखद वही जब दान में, देने को असमर्थ ॥
अध्याय 24. कीर्ति#
231 देना दान गरिब को, जीना कर यश-लाभ ।इससे बढ़ कर जीव को, और नहीं है लाभ ॥
232 करता है संसार तो, उसका ही गुण-गान ।याचक को जो दान में, कुछ भी करें प्रदान ॥
233 टिकती है संसार में, अनुपम कीर्ति महान ।अविनाशी केवल वही, और न कोई जान ॥
234 यदि कोई भूलोक में, पाये कीर्ति महान ।देवलोक तो ना करें, ज्ञानी का गुण-गान ॥
235 ह्रास बने यशवृद्धिकर, मृत्यु बने अमरत्व ।ज्ञानवान बिन और में, संभव न यह महत्व ॥
236 जन्मा तो यों जन्म हो, जिसमें होवे नाम ।जन्म न होना है भला, यदि न कमाया नाम ॥
237 कीर्तिमान बन ना जिया, कुढ़ता स्वयं न आप ।निन्दक पर कुढ़ते हुए, क्यों होता है ताप ॥
238 यदि नहिं मिली परंपरा, जिसका है यश नाम ।तो जग में सब के लिये, वही रहा अपनाम ॥
239 कीर्तिहीन की देह का, भू जब ढोती भार ।पावन प्रभूत उपज का, क्षय होता निर्धार ॥
240 निन्दा बिन जो जी रहा, जीवित वही सुजान ।कीर्ति बिना जो जी रहा, उसे मरा ही जान ॥
अध्याय 25. दयालुता#
241 सर्व धनों में श्रेष्ठ है, दयारूप संपत्ति ।नीच जनों के पास भी, है भौतिक संपत्ति ॥
242 सत्-पथ पर चल परख कर, दयाव्रती बन जाय ।धर्म-विवेचन सकल कर, पाया वही सहाय ॥
243 अन्धकारमय नरक है, जहाँ न सुख लवलेश ।दयापूर्ण का तो वहाँ, होता नहीं प्रवेश ॥
244 सब जीवों को पालते, दयाव्रती जो लोग ।प्राण-भयंकर पाप का, उन्हें न होगा योग ॥
245 दुःख- दर्द उनको नहीं, जो है दयानिधान ।पवन संचरित उर्वरा, महान भूमि प्रमाण ॥
246 जो निर्दय हैं पापरत, यों कहते धीमान ।तज कर वे पुरुषार्थ को, भूले दुःख महान ॥
247 प्राप्य नहीं धनरहित को, ज्यों इहलौकिक भोग ।प्राप्य नहीं परलोक का, दयारहित को योग ॥
248 निर्धन भी फूले-फले, स्यात् धनी बन जाय ।निर्दय है निर्धन सदा, काया पलट न जाय ॥
249 निर्दय-जन-कृत सुकृत पर, अगर विचारा जाय ।तत्व-दर्श ज्यों अज्ञ का, वह तो जाना जाय ॥
250 रोब जमाते निबल पर, निर्दय करे विचार ।अपने से भी प्रभल के, सम्मुख खुद लाचार ॥
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