
तिरुक्कूरळ - हिन्दी अनुवाद Chapter 16-20#
Thirukkural in Hindi, Chapters 16 to 20#
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Each chapter has ten verses. The Hindi text is the translation of M.G. Venkatakrishnan (1998).
भाग–१: धर्म- कांड
अध्याय 16. क्षमाशीलता#
151 क्षमा क्षमा कर ज्यों धरे, जो खोदेगा फोड़ ।निन्दक को करना क्षमा, है सुधर्म बेजोड़ ॥
152 अच्छा है सब काल में, सहना अत्याचार ।फिर तो उसको भूलना, उससे श्रेष्ठ विचार ॥
153 दारिद में दारिद्रय है, अतिथि-निवारण-बान ।सहन मूर्ख की मूर्खता, बल में भी बल जान ॥
154 अगर सर्व-गुण-पूर्णता, तुमको छोड़ न जाय ।क्षमा-भाव का आचरण, किया लगन से जाय ॥
155 प्रतिकारी को जगत तो, माने नहीं पदार्थ ।क्षमशील को वह रखे, स्वर्ण समान पदार्थ ॥
156 प्रतिकारी का हो मज़ा, एक दिवस में अन्त ।क्षमाशीला को कीर्ति है, लोक-अंत पर्यन्त ॥
157 यद्यपि कोई आपसे, करता अनुचित कर्म ।अच्छा उस पर कर दया, करना नहीं अधर्म ॥
158 अहंकार से ज़्यादती, यदि तेरे विपरीत ।करता कोई तो उसे, क्षमा-भाव से जीत ॥
159 संन्यासी से आधिक हैं, ऐसे गृही पवित्र ।सहन करें जो नीच के, कटुक वचन अपवित्र ॥
160 अनशन हो जो तप करें, यद्यपि साधु महान ।पर-कटुवचन-सहिष्णु के, पीछे पावें स्थान ॥
अध्याय 17. अनसूयता#
161 जलन- रहित निज मन रहे ऐसी उत्तम बान ।अपनावें हर एक नर, धर्म आचरण मान ॥
162 सबसे ऐसा भाव हो, जो है ईर्ष्या- मुक्त ।तो उसके सम है नहीं, भाग्य श्रेष्ठता युक्त ॥
163 धर्म- अर्थ के लाभ की, जिसकी हैं नहीं चाह ।पर-समृद्धि से खुश न हो, करता है वह डाह ॥
164 पाप- कर्म से हानियाँ, जो होती है जान ।ईर्ष्यावश करते नहीं, पाप- कर्म धीमान ॥
165 शत्रु न भी हो ईर्ष्यु का, करने को कुछ हानि ।जलन मात्र पर्याप्त है, करने को अति हानि ॥
166 दान देख कर जो जले, उसे सहित परिवार ।रोटी कपडे को तरस, मिटते लगे न बार ॥
167 जलनेवाले से स्वयं, जल कर रमा अदीन ।अपनी ज्येष्ठा के उसे , करती वही अधीन ॥
168 ईर्ष्या जो है पापिनी, करके श्री का नाश ।नरक-अग्नि में झोंक कर, करती सत्यानास ॥
169 जब होती ईर्ष्यालु की, धन की वृद्धि अपार ।तथा हानि भी साधु की, तो करना सुविचार ॥
170 सुख-समृद्धि उनकी नहीं, जो हों ईर्ष्यायुक्त ।सुख-समृद्धि की इति नहीं, जो हों ईर्ष्यामुक्त ॥
अध्याय 18. निर्लोभता#
171 न्याय-बुद्धि को छोड़ कर, यदि हो पर-धन-लोभ ।हो कर नाश कुटुम्ब का, होगा दोषारोप ॥
172 न्याय-पक्ष के त्याग से, जिनको होती लाज ।लोभित पर-धन-लाभ से, करते नहीं अकाज ॥
173 नश्वर सुख के लोभ में, वे न करें दुष्कृत्य ।जिनको इच्छा हो रही, पाने को सुख नित्य ॥
174 जो हैं इन्द्रियजित तथा, ज्ञानी भी अकलंक ।दारिदवश भी लालची, होते नहीं अशंक ॥
175 तीखे विस्तृत ज्ञान से, क्या होगा उपकार ।लालचवश सबसे करें, अनुचित व्यवहार ॥
176 ईश-कृपा की चाह से, जो न धर्म से भ्रष्ट ।दुष्ट-कर्म धन-लोभ से, सोचे तो वह नष्ट ॥
177 चाहो मत संपत्ति को, लालच से उत्पन्न ।उसका फल होता नहीं कभी सुगुण-संपन्न ॥
178 निज धन का क्षय हो नहीं, इसका क्या सदुपाय ।अन्यों की संपत्ति का, लोभ किया नहिं जाय ॥
179 निर्लोभता ग्रहण करें, धर्म मान धीमान ।श्री पहुँचे उनके यहाँ, युक्त काल थल जान ॥
180 अविचारी के लोभ से, होगा उसका अन्त ।लोभ- हीनता- विभव से, होगी विजय अनन्त ॥
अध्याय 19. अपिशुनता#
181 नाम न लेगा धर्म का, करे अधर्मिक काम । फिर भी अच्छा यदि वही, पाये अपिशुन नाम ॥
182 नास्तिवाद कर धर्म प्रति, करता पाप अखण्ड ।उससे बदतर पिशुनता, सम्मुख हँस पाखण्ड ॥
183 चुगली खा कर क्या जिया, चापलूस हो साथ ।भला, मृत्यु हो, तो लगे, शास्त्र- उक्त फल हाथ ॥
184 कोई मूँह पर ही कहे, यद्यपि निर्दय बात ।कहो पीठ पीछे नहीं, जो न सुचिंतित बात ॥
185 प्रवचन-लीन सुधर्म के, हृदय धर्म से हीन ।भण्डा इसका फोड़ दे, पैशुन्य ही मलीन ॥
186 परदूषक यदि तू बना, तुझमें हैं जो दोष ।उनमें चुन सबसे बुरे, वह करता है घोष ॥
187 जो करते नहिं मित्रता, मधुर वचन हँस बोल ।अलग करावें बन्धु को, परोक्ष में कटु बोल ॥
188 मित्रों के भी दोष का, घोषण जिनका धर्म ।जाने अन्यों के प्रति, क्या क्या करें कुकर्म ॥
189 क्षमाशीलता धर्म है, यों करके सुविचार ।क्या ढोती है भूमि भी, चुगलखोर का भार ॥
190 परछिद्रानवेषण सदृश, यदि देखे निज दोष ।ति अविनाशी जीव का, क्यों हो दुख से शोष ॥
अध्याय 20. वृथालाप-निषेध#
191 बहु जन सुन करते घृणा, यों जो करे प्रलाप ।सर्व जनों का वह बने, उपहासास्पद आप ॥
192 बुद्धिमान जनवृन्द के,सम्मुख किया प्रलाप ।अप्रिय करनी मित्र प्रति, करने से अति पाप ॥
193 लम्बी-चौड़ी बात जो, होती अर्थ-विहीन ।घोषित करती है वही, वक्ता नीति-विहीन ॥
194 संस्कृत नहीं, निरर्थ हैं, सभा मध्य हैं उक्त ।करते ऐसे शब्द हैं, सुगुण व नीति-वियुक्त ॥
195 निब्फल शब्द अगर कहे, कोई चरित्रवान ।हो जावे उससे अलग, कीर्ति तथा सम्मान ॥
196 जिसको निब्फल शब्द में, रहती है आसक्ति ।कह ना तू उसको मनुज, कहना थोथा व्यक्ति ॥
197 कहें भले ही साधुजन, कहीं अनय के शब्द ।मगर इसी में है भला, कहें न निब्फल शब्द ॥
198 उत्तम फल की परख का, जिनमें होगा ज्ञान ।महा प्रयोजन रहित वच, बोलेंगे नहिं जान ॥
199 तत्वज्ञानी पुरुष जो, माया-भ्रम से मुक्त ।विस्मृति से भी ना कहें, वच जो अर्थ-वियुक्त ॥
200 कहना ऐसा शब्द ही, जिससे होवे लाभ ।कहना मत ऐसा वचन, जिससे कुछ नहिं लाभ ॥
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